नवराज न्यूज़
जालंधर, निकाय चुनावों में पहली बार अकेली लड़ी पंजाब भाजपा होशियारपुर और पठानकोट जैसे अपने गढ़ गंवा बैठी, फिर भी किसी नेता ने हार की जिम्मेदारी नहीं ली। अभी तक पार्टी में सिर्फ मंथन की बातें चल रही हैं और तत्काल बदलाव के आसार नहीं है। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि पंजाब में भाजपा पहले ही २३ साल से अकाली दल के सहारे थी। अचानक कृषि सुधार कानून को लेकर पहले अकाली दल से गठजोड़ टूटा। किसान आंदोलन के चलते पंजाब में भाजपा का जमकर विरोध हुआ। इस बीच चुनाव हुए और भाजपा हार गई। जिस तरह पूरे पंजाब के घर-घर से भाजपा के विरोध हुआ, उसके बावजूद सूपड़ा साफ होने बचे नेता अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब रहे।
निचले स्तर के नेता और कार्यकर्ता इस प्रदर्शन से ज्यादा इस बात से नाखुश हैं कि पंजाब भाजपा सबको साथ लेकर चलने में सफल नहीं हो पा रही। गठजोड़ टूटने के बाद राज्य से लेकर गांव-मोहल्ले का नेता व कार्यकर्ता सक्रिय हो, तभी अकेले चुनाव लड़ने व जीतने के बारे में सोचा जा सकता है। फिर भी किसी तरह के बदलाव के लिए अभी ४-५ महीने का इंतजार हो सकता है।

कृषि सुधार कानूनों के बाद चर्चा में आए केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने पंजाब निकाय चुनावों में भाजपा की करारी हार को गठबंधन से जोड़ा था। तोमर ने कहा था कि गठजोड़ टूटने की वजह से वो इस तरह हारे। हालांकि, पंजाब प्रधान अश्विनी शर्मा ने कहा कि गठबंधन टूटने का कोई नुकसान नहीं हुआ। भाजपा पहले ही कम सीटों पर चुनाव लड़ती थी। कार्यकर्ताओं का असंतोष व उसके बीच इस तरह की सार्वजनिक असहमति पंजाब लीडरशिप व भाजपा हाईकमान के बीच बड़ी लकीर खींच सकती है क्योंकि केंद्र सरकार के लिए मुसीबत बने किसान आंदोलन से कृषि मंत्री तोमर ही आगे होकर बातचीत कर रहे हैं। इस वजह से अक्सर वह किसान संगठनों के निशाने पर भी रहते हैं।

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